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maharana pratap-महाराणा प्रताप का इतिहास-महाराणा प्रताप का जीवन परिचय

इस पोस्ट में महाराणा प्रताप की पूरी जानकारी हे | महाराणा प्रताप का इतिहास-महाराणा प्रताप का जीवन परिचय “तप करती सदियों तक धरती ,युगो युगो तक जाप | तब जाकर पैदा होता है ,जग में एक प्रताप “| मेवाड़ माटी ने ऐसा पूत सपूत एक पैदा किया आजादी का जिसने सबसे पहले अलख जगाया |- maharana pratap

संकट की धड़ी में जो एक पल भी नहीं डग मगाया अपना सर देना स्वीकार किया पर सर कभी न झुकाया ,तपती सूरज की किरणे आन बान और शान ,जिसकी कीर्ति किरणों से चमका सारा हिंदुस्तान – maharana pratap,महाराणा प्रताप का इतिहास-महाराणा प्रताप का जीवन परिचय

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महाराणा प्रताप का इतिहास-महाराणा प्रताप का जीवन परिचय,शत्रु ने मेवाड़ हतियाने की पूरी कोशिश की लेकिन सदियों से स्वतंत्र धरा ,अब पीड़ा से अकुलाई | ऐसे में इतिहास पुरुष राणा प्रताप को धरती ममता की सुध आयी ,धरती का अभियान बचने ,वीर पुरुष ने अपनी तलवार उठायी | हरित ऋषि फिर से कोई जाप पैदा हो | स्वतंत्रता की राष्ट्र में फिर एक छाप पैदा हो,मेवाड़ की माटी ये मानती हे मनौती,हर युग में मेरी कोख से प्रताप पैदा हो | maharana pratap

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maharana pratap का जीवन परिचय

महाराणा प्रताप का जन्म राजपूत वंश के सिसोदिया राजवंश में 9 मई , सन 1540 में  हुआ | महाराणा प्रताप के बचपन का नाम कीका(छोटा बच्चा )था आदिवासी भाषा में जिसका अर्थ छोटा बच्चा होता हे |

प्रताप बाल्ये  काल से ही साहसी थे| राणा प्रताप के पिता का नाम उदयसिह था जोकि स्वयं भी एक प्रतापी शासक हुए ,देशप्रेम और स्वामी भक्ति तो मनो राणा प्रताप को विरासत में मिली थी | महाराणा प्रताप का जन्म कुंभलगढ़ (जिला ,राजसमंद )में हुआ और 1572 ईस्वी में गोगुन्दा (राजसमंद )में राजसिंहासन पर बैठाया गया जब प्रताप को सिंहासन पर बैठाया गया तब उनकी उम्र 32 वर्ष थी | maharana pratap

प्रताप ने कभी भी अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की ,प्रसिद्ध विदेशी इतिहासकार  “स्मिथ”  का कथन हे की राणा प्रताप विरो में श्रेष्ट था | जब दूसरे राजाओ ने अपना गौरव और सम्मान को मुग़ल सल्तनत की बेसुमार ताकत के सामने गिरवी रख दिया उस विषम एव भीषण परिस्तिथि में भी प्रताप अकबर से लोहा लेता रहा

और उसके दांत खट्टे करता रहा इतिहास प्रसिद्ध हल्दीघाटी का युद्ध जिसमे अपने अद्भुत पराक्रम और सहस के बल पर ,मुट्ठी भर सेनिको के साथ मुग़ल सल्तनत को लोहे के चने चबाने पर मजबूर करता रहा | अंत में हार प्रताप की जरूर हुए लेकिन ,ऐसे पराकर्म न किसी ने देखा न सुना , अपनी आन के लिए ऐसे बलिदान को इतिहास हमेशा याद रखेगा | maharana pratap

maharana pratap का इतिहास

प्रताप के पिता उदयसिंह महाराणा सांगा  के पौत्र (पोते )थे महाराणा सांगा (संग्राम  सिंह ) बहुत प्रतापी शासक थे | ऐसा कहा जाता हे की महाराणा सांगा के शरीर पर 80 धाव थे जो उनकी वीरता का सबसे बड़ा  साबुत था | बाबर और राणा सांगा  के बिच हुए ऐतिहासिक  युद्ध “ खानवा का युद्ध ” (17 मार्च 1527 )इतिहास प्रसिद्ध हे| सांगा का पुत्र राणा विक्रमादित्ये (शासन 1531 -1336 )था |

राणा सांगा के बाद विक्रमादित्ये (1531 -1536 )मेवाड़  के शासक बने राणा प्रताप के पिता उदय सिंह विक्रमादित्ये के पुत्र थे ,जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया तब विक्रमादित्ये मेवाड़ के शासक थे और उदय सिंह छोटे बालक थे | दासी पुत्र बनवीर ने सुल्तान से मिलकर मेवाड़  पर शासन करने की मनसा से विक्रमादित्ये की सोते हुए तलवार से हत्या कर दी | दासीपुत्र बनवीर बालक उदय सिंह को भी मरना चाहता था लेकिन स्वामी भक्त पन्नाधाय ने अपने पुत्र चन्दन की बली चढ़ा दिया और उदयसिंह की जान बचा ली |

अकबर ने सबसे पहले महाराणा प्रताप को अपनी अधीनता स्वीकार करने के लिए 1572 ईस्वी में  ‘जलाल खां “दूत के रूप में भेजा पश्चात्  क्रमश – मानसिंह ,भगवंत दास  तथा अंत में टोडरमल ” को भेजा लेकिन प्रताप ने अधीनता स्वीकार नहीं की अकबर ने  प्रताप को  अधीन करने हेतु 2 अप्रैल ,1576 में एक विशाल सेना को आक्रमण करने हेतु “हल्दीघाटी “की और रवाना किया | maharana pratap

हल्दीघाटी का युद्ध –

(राज समंद ) का युद्ध  विश्व प्रसिद्ध हे 21 जून  1576 – एक तरफ मानसिंह के नेतृत्व में मुगलो की विशाल सेना और दूसरी और हल्दीघाटी के मैदान में महाराणा प्रताप की छोटी सी सेना |

एक भीषण युद्ध हुआ जिसमे प्रताप की सेना की हार हुए लेकिन प्रताप के प्राकर्म को हमेशा याद किया जायेगा “कर्नल जेम्स टाड ” ने अपनी किताब Annals and Antiquities of Rajasthan में इस युद्ध को मेवाड़ का ” थर्मोपल्ली ” कहा वे दिवेर के युद्ध को “मेवाड़ का मैराथॉन “कहा महाराणा प्रताप  जब मुग़ल सेना से घिर गए थे तब “झाला  बिदा ” ने  उनके सर का राजकीय छत्र  छीन कर अपने सर पर धारण किया और लड़ते लड़ते शहीद हो गए | हल्दीघटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व “हकीम खां सूरी ” ने किया था |

हल्दीघाटी का युद्ध

अन्य नाम – मेवाड़ की थर्मोपॉली(कर्नल टाड ),खमनौर का युद्ध (अबुल फजल ),गोगुन्दा का युद्ध (बदायूंनी )

कुंभलगढ़ का युद्ध-(1578)

सम्बंधित पक्ष – महाराणा प्रताप और शाहबाज खां के मध्ये |

युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप अपने परिवार सहित चूलिया गांव में आ बेस जहां प्रताप की मुलाकात अपने मित्र “भामाशाह” वे उसके भाई ताराचंद से हुई जिहोने राणा की आर्थिक सहायता की जिससे महाराणा प्रताप को सेना संगठित  मदद मिली |

दिवेर का युद्ध (1582 ई )

अजमेर मेवाड़ मार्ग में स्थित महत्वपूर्ण चौकी “दिवेर “पर सुल्तान खां के नेतृत्व में मुग़ल सेना का कब्ज़ा था | इस पर प्रताप के नेतृत्व में मेवाड़ी सरदार ने धावा बोल कर सुल्तान खा को हराकर इस पर कब्ज़ा कर लिया | इस युद्ध में महाराणा के पुत्र अमरसिंह ने अधभुत सहस का परिचय दिया | कर्नल जेम्स टाड ने दिवेर के युद्ध को ” मेवाड़ का मेराथन ” कहा हे |

महाराणा प्रताप ने लूना राठौर को चावंड से खदेड़ कर चावंड को अपनी राजघानी बना लिया तथा यहां पर चामुंडा (चावण्डा ) माता का मंदिर बनवाया चावंड में 19 जनवरी ,1597 को महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गयी | – maharana pratap

मेवाड़ का संक्षिप्त इतिहास

मोर्ये काल में भारत सोलह जनपदों में विभक्त था जिसमे “शिवि जनपद (मेवाड़ का अधिकांश क्षेत्र ) भी था चित्तोड़ का अधिकांश क्षेत्र  इसी जनपद में आता हे | इतिहास कारो का मानना हे की मौर्य राजा चित्रांग (चित्रांगद ) दुवारा सातवीं सताब्दी लगभग चित्रकोट (वर्तमान चितोड़ ) की स्थापना की | विश्व में सर्वाधिक समय तक शासन करने वाला राजवंश “गुहिल “(सिसोदिया ) माना जाता हे |

गुहिल राजवंश की नीव गुहादित्ये “(गुहिल ) ने 566 इ. में डाली जो आनंद पुर के अंतिम शासक थे और राजा शिलादित्ये का पुत्र था गुहिल वंश की प्रारम्भि राजधानी “नागदा” थी गुहिल वंश के शासक नागादित्ये के पश्चात “बाप्पा रावल ” गुहिल वंश के प्रथम प्रतापी शासक हुए | जिसे हारित ऋषि के आशीर्वाद से मेवाड़ का राज्ये प्राप्त हुआ – maharana pratap

बाप्पा रावल –

बाप्पा रावल का मूल नाम कालभोज था जबकि “बाप्पा ” उसकी उपथि थी | बाप्पा रावल ने “मोर्ये शासक “मानमोरी “को हराकर चित्तोड़ पर अधिकार कर लिया बाप्पा  ने सोने के सिक्के चलाये तथा कैलाशपुरी में एकलिंग जी का मंदिर बनवाया बाप्पा के वंशज अल्लट ने “आहड़ “को अपनी राजधानी बनाया क्षेत्र सिंह के पुत्र कुमार सिंह  ने जालोर के चौहान शासक कीर्तिपाल को हराकर मेवाड़ को पुनः कब्जे में कर लिया कुमार सिंह का पुत्र जैत्रसिंह एक प्रतापी शासक था

जैत्रसिंह ने नागदा के स्थान पर चितोड़ को अपनी राजधानी बनाया जैत्रसिंह ने दिल्ली सुल्तान “इल्ततुमिस “के आक्रमण को विफल किया समकालीन सिहं शासक उदयसिह ने अपनी पुत्री “रूपा देवी ” का विवाह जैत्रसिंह से करके समझौता कर लिया ,जैत्रसिंह के दो पुत्र हुए –तेज सिंह व् समरसिंह

रावल रतन सिंह

रावल रतन सिंह – समर सिंह के पश्चात रावल रतन सिंह चित्तोड़ की दद्दी पर बैठा | रतनसिह की रानी “पद्मनी  “(पद्मावती )”सिंहल द्वीप के राजा गन्धर्व सेन की पुत्री थी | रतनसिह को पद्मनी के बारे में गंधर्वसेन के पालतू तोते “हिरामन “ने बताया था जिसे उसने एक ब्राह्मण से ख़रीदा था | रतनसिह ने 12 वर्ष सिंहल दिप में योगी के वेश में रहकर पध्मनि से प्रेम विवाह रचाया था |

सुल्तान “अल्लाउद्दीन खलजी “को पद्मिनी के सोन्दर्ये के बारे में  चित्तोड़ से निवासित “ राघव चेतन “ने बताया था पद्मिनी  पाने की चाह में सुल्तान ने चितोड़ पर आक्रमण कर दिया ,प्रसिद्ध इतिहास कर “आमिर खुसरो “अल्लाउदीन के साथ था 1303 ईस्वी में हुए इस युद्ध को इतिहास प्रसिद्ध माना जाता हे क्योकि इस युद्ध  को चितोड़ का पहला “साका ” माना जाता हे “रानी पद्मिनी ने 16000 रानियों के साथ जोहर किया था | और सभी वीर लड़ते -लड़ते  वीरगति को प्राप्त हुए, जिसमे गोरा और बदल ” ने अद्भुत प्राकर्म पेश किया |

राणा हमीर – मालदेव चौहान की 1321 ईस्वी में मृत्यु उपरांत सिसोदा के सरदार हमीर देव ने 1326 ईस्वी में चित्तौड़ पर अधिकार कर सिसोदिया वंशकी नीव डाली राणा हमीर ने दिल्ली सुल्तान तुगलक के आक्रमण को विफल किया इसके बाद राणा हमीर को “विषम घाटी “पंचानन की उपाधि महाराणा कुम्भा दुवारा रचित “रसिक प्रिया ” टिका एंव कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति में मिलती हे |

महाराणा लाखा –

महाराणा लाखा 1382 ईस्वी में हमीर के पुत्र  क्षेत्र सिंह के पुत्र “लाखा “(लक्ष सिंह ) चितोड़ के सिंहासन पर बैठा  राठौर शासक राव चूड़ा का बड़ा पुत्र राव रणमल  उत्तराधिकारी न बनने से नाराज महाराणा लाखा की सेवा में गया राणा ने सेना भेज कर मंडोर पर अदिकार करने में रणमल की मदद की रणमल ने अपनी बहन “हंसा बाई ” की शादी लाखा से शादी इस शर्त पर करदी की उत्तराधिकारी हंसा का पुत्र ही होगा लाखा क पुत्र राव चूड़ा ने शर्त वचन को निभाते हुए उत्तराधिकारी न बनने और आजीवन कुंवारा रहने की “भीष्म प्रतिज्ञा ली “अतः “राव चूड़ा को राजस्थान का “भीष्म ” भी कहा जाता हे – maharana pratap

महाराणा कुम्भा-(1433 -1468 )

कुम्भा  1433 में चितोड़ का महाराणा बना जोकि मोकल और सौभाग्यवती का पुत्र था कुम्भा के शासन काल में मंडोर के शासक रणमल की हत्या मेवाड़ हुई कुम्बा ने चूड़ा को भेज कर मंडोर पर अधिकार कर लिया महाराणा कुम्भा को मेवाड़ और राजस्थान स्थाप्तये कला का जनक माना जाता हे सारंगपुर के युद्ध (कुम्भा वे महमूद खिलजी के मध्ये ) में विजय होने पर “विजय स्तम्भ ” का निर्माण करवाया | कुम्भा के शासन काल को चित्तोड़ का स्वर्ण युग कहा जाता हे |

महाराणा उदा – उदा राणा कुम्भा का पुत्र जिस पर कलंक हे अपने पिता कुम्भा को मरने का उदा ने सोते हुए राणा  कुम्भा का वध कर दिया | इस तथ्ये पर एक कथन सर्व व्यापी हे

 ” उदा बाप ने मारजे,लिखियो लाभै राज|

 देश बसायो रायमल ,सरयो न एको काज |

कुम्भा को मारक कर उदा शासक बना लेकिन जल्द ही  कुम्भा के छोटे पुत्र “रायमल” को महाराणा घोषित कर दिया गया रायमल के शासन काल में मेवाड़ के कुछ हिस्सों पर पडोसी राज्यों ने कब्ज़ा कर लिया था

महाराणा  सांगा – प्रताप के पिता उदयसिंह महाराणा सांगा  के पौत्र (पोते )थे महाराणा सांगा (संग्राम  सिंह ) बहुत प्रतापी शासक थे | ऐसा कहा जाता हे की महाराणा सांगा के शरीर पर 80 धाव थे जो उनकी वीरता का सबसे बड़ा  साबुत था | बाबर और राणा सांगा  के बिच हुए ऐतिहासिक  युद्ध “ खानवा का युद्ध ” (17 मार्च 1527 )इतिहास प्रसिद्ध हे| 

महाराणा प्रताप का स्मारक

महाराणा प्रताप ने लूणा राठौर को चावंड से खदेड़ कर चावण्ड (चावण्डा ) माता का मंदिर बनवाया चावंड में 19 जनवरी ,1597 में प्रताप की मृतयु हो गयी चावंड के निकट ” बाड़ोली नामक स्थान “ पर प्रताप का अंतिम संस्कार किया गया जहाँ पर आठ खम्भों पर बनी महाराणा प्रताप की भविये छतरी हे | उदयपुर जिले में City Palace Museum हे जोकि पहले महाराणा का महल हुआ करता था वहा महारणा प्रताप का म्यूजियम के जिसमे उनके वस्त्र, भाला ,कवच ,तलवार रखी हुई हे |

महाराणा प्रताप का स्मारक

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